वाल्मीकि रामायण 7.49.9
अर्घ्यमादाय रुचिरं जाह्नवीतीरमागमत् ।ददर्श राघवस्येष्टां सीतां पत्नीमनाथवत्॥
arghyamādāya ruciraṃ jāhnavītīramāgamat |dadarśa rāghavasyeṣṭāṃ sītāṃ patnīmanāthavat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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