वाल्मीकि रामायण 7.50.15
ऋषेस्तु वचनं श्रुत्वा मामाह पुरुषर्षभः ।सूत न क्वचिदेवं ते वक्तव्यं जनसन्निधौ॥
ṛṣestu vacanaṃ śrutvā māmāha puruṣarṣabhaḥ |sūta na kvacidevaṃ te vaktavyaṃ janasannidhau ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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