वाल्मीकि रामायण 7.51.4
स दृष्ट्वा सूर्यसङ्काशं ज्वलन्तमिव तेजसा ।उपविष्टं वसिष्ठस्य सव्यपार्श्वे महामुनिम्॥
sa dṛṣṭvā sūryasaṅkāśaṃ jvalantamiva tejasā |upaviṣṭaṃ vasiṣṭhasya savyapārśve mahāmunim ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें