वाल्मीकि रामायण 7.54.12
पुष्पाणि च सुगन्धीनि क्रियतां तेषु नित्यशः ।परिवार्य यथा मे स्युरध्यर्धं योजनं तथा॥
puṣpāṇi ca sugandhīni kriyatāṃ teṣu nityaśaḥ |parivārya yathā me syuradhyardhaṃ yojanaṃ tathā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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