वाल्मीकि रामायण 7.54.3
श्रुत्वा तु पापसंयुक्तमात्मानं पुरषर्षभ ।किमुवाच नृगो राजा द्विजौ क्रोधसमन्वितौ॥
śrutvā tu pāpasaṃyuktamātmānaṃ puraṣarṣabha |kimuvāca nṛgo rājā dvijau krodhasamanvitau ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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