वाल्मीकि रामायण 7.55.2
एवमुक्तस्तु रामेण सौमित्रिः पुनरब्रवीत् ।तृप्तिराश्चर्यभूतानां कथानां नास्ति मे नृप॥
evamuktastu rāmeṇa saumitriḥ punarabravīt |tṛptirāścaryabhūtānāṃ kathānāṃ nāsti me nṛpa ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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