वाल्मीकि रामायण 7.57.7
कस्यचित्त्वथ कालस्य मित्रावरुणसम्भवः ।वसिष्ठस्तेजसा युक्तो जज्ञे इक्ष्वाकुदैवतम्॥
kasyacittvatha kālasya mitrāvaruṇasambhavaḥ |vasiṣṭhastejasā yukto jajñe ikṣvākudaivatam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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