वाल्मीकि रामायण 7.59.1
श्रुत्वा तूशनसं क्रुद्धं तदा ऽ ऽर्तो नहुषात्मजः ।जरां परमिकां प्राप्य यदुं वचनमब्रवीत्॥
śrutvā tūśanasaṃ kruddhaṃ tadā ' 'rto nahuṣātmajaḥ |jarāṃ paramikāṃ prāpya yaduṃ vacanamabravīt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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