वाल्मीकि रामायण 7.59.7
नाहुषेणैवमुक्तस्तु पूरुः प्राञ्जलिरब्रवीत् ।धन्यो ऽस्म्यनुगृहीतो ऽस्मि शासने ऽस्मि तव स्थितः॥
nāhuṣeṇaivamuktastu pūruḥ prāñjalirabravīt |dhanyo 'smyanugṛhīto 'smi śāsane 'smi tava sthitaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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