वाल्मीकि रामायण 7.6.67
सुपर्णं गिरिसङ्काशं वैनतेयमथास्थितः ।राक्षसानामभावाय ययौ तूर्णतरं प्रभुः॥
suparṇaṃ girisaṅkāśaṃ vainateyamathāsthitaḥ |rākṣasānāmabhāvāya yayau tūrṇataraṃ prabhuḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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