वाल्मीकि रामायण 7.60.7
शतं समधिकं तत्र दीप्यमानं स्वतेजसा ।प्रविष्टं राजभवनं तापसानां महात्मनाम्॥
śataṃ samadhikaṃ tatra dīpyamānaṃ svatejasā |praviṣṭaṃ rājabhavanaṃ tāpasānāṃ mahātmanām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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