वाल्मीकि रामायण 7.67.4
असङ्ख्येयानि कर्माणि यान्यस्य रघुनन्दन ।इक्ष्वाकुवंशप्रभवे यद्वृत्तं तच्छृणष्व मे॥
asaṅkhyeyāni karmāṇi yānyasya raghunandana |ikṣvākuvaṃśaprabhave yadvṛttaṃ tacchṛṇaṣva me ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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