वाल्मीकि रामायण 7.68.7
आहारश्चास्य सम्पूर्णो ममायं पुरुषाधम ।स्वयं प्रविष्टो ऽद्य मुखं कथमासाद्य दुर्मते॥
āhāraścāsya sampūrṇo mamāyaṃ puruṣādhama |svayaṃ praviṣṭo 'dya mukhaṃ kathamāsādya durmate ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें