वाल्मीकि रामायण 7.70.15
तां समृद्धां समृद्धार्थः शत्रुघ्नो भरतानुजः ।निरीक्ष्य परमप्रीतः परं हर्षमुपागमत्॥
tāṃ samṛddhāṃ samṛddhārthaḥ śatrughno bharatānujaḥ |nirīkṣya paramaprītaḥ paraṃ harṣamupāgamat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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