वाल्मीकि रामायण 7.71.5
बहुरूपाः सुमधुराः कथास्तत्र सहस्रशः ।कथयामास स मुनिः शत्रुघ्नाय महात्मने॥
bahurūpāḥ sumadhurāḥ kathāstatra sahasraśaḥ |kathayāmāsa sa muniḥ śatrughnāya mahātmane ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें