वाल्मीकि रामायण 7.77.17
उपस्पृश्य यथान्यायं स स्वर्गी रघुपुङ्गव ।आरोढुमुपचक्राम विमानवरमुत्तमम्॥
upaspṛśya yathānyāyaṃ sa svargī raghupuṅgava |āroḍhumupacakrāma vimānavaramuttamam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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