वाल्मीकि रामायण 7.77.19
को भवान्देवसङ्काश आहारश्च विगर्हितः ।त्वयेदं भुज्यते सौम्य किमर्थं वक्तुमर्हसि॥
ko bhavāndevasaṅkāśa āhāraśca vigarhitaḥ |tvayedaṃ bhujyate saumya kimarthaṃ vaktumarhasi ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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