वाल्मीकि रामायण 7.78.8
सो ऽहं वनमिदं दुर्गं मृगपक्षिविवर्जितम् ।तपश्चर्तुं प्रविष्टो ऽस्मि समीपे सरसः शुभे॥
so 'haṃ vanamidaṃ durgaṃ mṛgapakṣivivarjitam |tapaścartuṃ praviṣṭo 'smi samīpe sarasaḥ śubhe ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें