वाल्मीकि रामायण 7.79.3
तद्वनं स कथ राजा शून्यं मनुजवर्जितम् ।तपश्चर्तुं प्रविष्टः स श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः॥
tadvanaṃ sa katha rājā śūnyaṃ manujavarjitam |tapaścartuṃ praviṣṭaḥ sa śrotumicchāmi tattvataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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