वाल्मीकि रामायण 7.93.3
शकटांश्च बहून्पूर्णान्फलमूलैश्च शोभनान् ।वाल्मीकिवाटे रुचिरे स्थापयन्नविदूरतः॥
śakaṭāṃśca bahūnpūrṇānphalamūlaiśca śobhanān |vālmīkivāṭe rucire sthāpayannavidūrataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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