वाल्मीकि रामायण 7.93.7
रामस्य भवनद्वारि यत्र कर्म च कुर्वते ।ऋत्विजामग्रतश्चैव तत्र गेयं विशेषतः॥
rāmasya bhavanadvāri yatra karma ca kurvate |ṛtvijāmagrataścaiva tatra geyaṃ viśeṣataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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