वाल्मीकि रामायण 7.96.4
गर्गश्च च्यवनश्चैव शतानन्दश्च धर्मवित् ।भरद्वाजश्च तेजस्वी ह्यग्निपुत्रश्च सुप्रभः॥
gargaśca cyavanaścaiva śatānandaśca dharmavit |bharadvājaśca tejasvī hyagniputraśca suprabhaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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