वाल्मीकि रामायण 7.98.10
सपर्वतवनां कृत्स्नां विधमिष्यामि ते स्थितम् ।नाशयिष्याम्यहं भूमिं सर्वमापो भवत्विह॥
saparvatavanāṃ kṛtsnāṃ vidhamiṣyāmi te sthitam |nāśayiṣyāmyahaṃ bhūmiṃ sarvamāpo bhavatviha ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें