महाभारत 1.187.6
कामया ब्रूहि सत्यं त्वं सत्यं राजसु शोभतेइष्टापूर्तेन च तथा वक्तव्यमनृतं न तु
kāmayā brūhi satyaṃ tvaṃ satyaṃ rājasu śobhateiṣṭāpūrtena ca tathā vaktavyamanṛtaṃ na tu
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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