महाभारत 1.94.75
यस्य हि त्वं सपत्नः स्या गन्धर्वस्यासुरस्य वान स जातु सुखं जीवेत्त्वयि क्रुद्धे परंतप
yasya hi tvaṃ sapatnaḥ syā gandharvasyāsurasya vāna sa jātu sukhaṃ jīvettvayi kruddhe paraṃtapa
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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