महाभारत 12.137.21
पूजन्युवाचसकृत्कृतापराधस्य तत्रैव परिलम्बतःन तद्बुधाः प्रशंसन्ति श्रेयस्तत्रापसर्पणम्
pūjanyuvācasakṛtkṛtāparādhasya tatraiva parilambataḥna tadbudhāḥ praśaṃsanti śreyastatrāpasarpaṇam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें