महाभारत 12.198.5
मनस्त्वपहृतं बुद्धिमिन्द्रियार्थनिदर्शनम्न समक्षं गुणावेक्षि निर्गुणस्य निदर्शनम्
manastvapahṛtaṃ buddhimindriyārthanidarśanamna samakṣaṃ guṇāvekṣi nirguṇasya nidarśanam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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