महाभारत 13.132.50एवंभूतो नरो देवि निरयं प्रतिपद्यतेविपरीतस्तु धर्मात्मा रूपवानभिजायतेevaṃbhūto naro devi nirayaṃ pratipadyateviparītastu dharmātmā rūpavānabhijāyateइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें