महाभारत 13.132.51
निरयं याति हिंसात्मा याति स्वर्गमहिंसकःयातनां निरये रौद्रां स कृच्छ्रां लभते नरः
nirayaṃ yāti hiṃsātmā yāti svargamahiṃsakaḥyātanāṃ niraye raudrāṃ sa kṛcchrāṃ labhate naraḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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