महाभारत 13.65.22
भीष्म उवाच · bhīṣma uvāca
ततोऽगस्त्यश्च कण्वश्च भृगुरत्रिर्वृषाकपिःअसितो देवलश्चैव देवयज्ञमुपागमन्
tato'gastyaśca kaṇvaśca bhṛguratrirvṛṣākapiḥasito devalaścaiva devayajñamupāgaman
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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