महाभारत 14.78.14
संनह्य काञ्चनं वर्म शिरस्त्राणं च भानुमत्तूणीरशतसंबाधमारुरोह महारथम्
saṃnahya kāñcanaṃ varma śirastrāṇaṃ ca bhānumattūṇīraśatasaṃbādhamāruroha mahāratham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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