महाभारत 2.45.31
मुहुर्मुहुः प्रणदतस्तस्य शङ्खस्य भारतउत्तमं शब्दमश्रौषं ततो रोमाणि मेऽहृषन्
muhurmuhuḥ praṇadatastasya śaṅkhasya bhāratauttamaṃ śabdamaśrauṣaṃ tato romāṇi me'hṛṣan
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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