महाभारत 3.162.5पार्थानभ्याजगामाशु देवराजः पुरंदरःआगत्य च सहस्राक्षो रथादवरुरोह वैpārthānabhyājagāmāśu devarājaḥ puraṃdaraḥāgatya ca sahasrākṣo rathādavaruroha vaiइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें