महाभारत 3.203.39
सर्वोपायैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रहःएतत्पवित्रं यज्ञानां तपो वै संक्रमो मतः
sarvopāyaistu lobhasya krodhasya ca vinigrahaḥetatpavitraṃ yajñānāṃ tapo vai saṃkramo mataḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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