महाभारत 5.138.21
किङ्किणीशतनिर्घोषं वैयाघ्रपरिवारणम्रथं श्वेतहयैर्युक्तमर्जुनो वाहयिष्यति
kiṅkiṇīśatanirghoṣaṃ vaiyāghraparivāraṇamrathaṃ śvetahayairyuktamarjuno vāhayiṣyati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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