महाभारत 5.70.77
ईदृशे ह्यर्थकृच्छ्रेऽस्मिन्कमन्यं मधुसूदनउपसंप्रष्टुमर्हामि त्वामृते पुरुषोत्तम
īdṛśe hyarthakṛcchre'sminkamanyaṃ madhusūdanaupasaṃpraṣṭumarhāmi tvāmṛte puruṣottama
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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