वाल्मीकि रामायण 1.1.25
तम् व्रजंतम् प्रियो भ्राता लक्ष्मणः अनुजगाम ह ।स्नेहात् विनय संपन्नः सुमित्र आनंद वर्धनः॥
tam vrajaṃtam priyo bhrātā lakṣmaṇaḥ anujagāma ha |snehāt vinaya saṃpannaḥ sumitra ānaṃda vardhanaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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