वाल्मीकि रामायण · 100 श्लोक
यह अध्याय पुस्तक में पढ़ेंतपस्स्वाध्याय निरतं तपस्वी वाग्विदां वरम् ।नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुंगवम्॥
tapassvādhyāya nirataṃ tapasvī vāgvidāṃ varam |nāradaṃ paripapraccha vālmīkirmunipuṃgavam ||
कोन्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् ।धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो धृढव्रतः॥
konvasmin sāmprataṃ loke guṇavān kaśca vīryavān |dharmajñaśca kṛtajñaśca satyavākyo dhṛḍhavrataḥ ||
चारित्रेण च को युक्तः सर्वभूतेषु को हितः ।विद्वान् कः कः समर्थश्च कश्च एक प्रियदर्शनः॥
cāritreṇa ca ko yuktaḥ sarvabhūteṣu ko hitaḥ |vidvān kaḥ kaḥ samarthaśca kaśca eka priyadarśanaḥ ||
आत्मवान् को जित क्रोधो द्युतिमान् कः अनसूयकः ।कस्य बिभ्यति देवाः च जात रोषस्य संयुगे॥
ātmavān ko jita krodho dyutimān kaḥ anasūyakaḥ |kasya bibhyati devāḥ ca jāta roṣasya saṃyuge ||
एतत् इच्छामि अहम् श्रोतुम् परम् कौतूहलम् हि मे ।महर्षे त्वम् समर्थोऽसि ज्ञातुम् एवम् विधम् नरम्॥
etat icchāmi aham śrotum param kautūhalam hi me |maharṣe tvam samartho'si jñātum evam vidham naram ||
श्रुत्वा च एतत् त्रिलोकज्ञो वाल्मीकेः नारदो वचः ।श्रूयताम् इति च आमंत्र्य प्रहृष्टो वाक्यम् अब्रवीत्॥
śrutvā ca etat trilokajño vālmīkeḥ nārado vacaḥ |śrūyatām iti ca āmaṃtrya prahṛṣṭo vākyam abravīt ||
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