वाल्मीकि रामायण 1.44.3
तारिता नरशार्दूल दिवम् याताः च देववत् ।षष्टिः पुत्र सहस्राणि सगरस्य महात्मनः॥
tāritā naraśārdūla divam yātāḥ ca devavat |ṣaṣṭiḥ putra sahasrāṇi sagarasya mahātmanaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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