वाल्मीकि रामायण 1.44.4
सागरस्य जलम् लोके यावत् स्थास्यति पार्थिव ।सगरस्य आत्मजाः सर्वे दिवि स्थास्यन्ति देववत्॥
sāgarasya jalam loke yāvat sthāsyati pārthiva |sagarasya ātmajāḥ sarve divi sthāsyanti devavat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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