वाल्मीकि रामायण 1.52.4
प्रतिगृह्य तु ताम् पूजाम् वसिष्ठात् राज सत्तमः ।तपो अग्नि होत्र शिष्येषु कुशलम् पर्यपृच्छत॥
pratigṛhya tu tām pūjām vasiṣṭhāt rāja sattamaḥ |tapo agni hotra śiṣyeṣu kuśalam paryapṛcchata ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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