वाल्मीकि रामायण 1.63.2
अब्रवीत् सु महातेजा ब्रह्मा सु रुचिरम् वचः ।ऋषिः त्वम् असि भद्रम् ते स्व अर्जितैः कर्मभिः शुभैः॥
abravīt su mahātejā brahmā su ruciram vacaḥ |ṛṣiḥ tvam asi bhadram te sva arjitaiḥ karmabhiḥ śubhaiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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