वाल्मीकि रामायण 1.75.28
योजयस्व धनुः श्रेष्ठे शरम् पर पुरम् जयम् ।यदि शक्तः असि काकुत्स्थ द्वन्द्वम् दास्यामि ते ततः॥
yojayasva dhanuḥ śreṣṭhe śaram para puram jayam |yadi śaktaḥ asi kākutstha dvandvam dāsyāmi te tataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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