वाल्मीकि रामायण 1.77.1
गते रामे प्रशांत आत्मा रामो दाशरथिः धनुः ।वरुणाय अप्रमेयाय ददौ हस्ते महायशाः॥
gate rāme praśāṃta ātmā rāmo dāśarathiḥ dhanuḥ |varuṇāya aprameyāya dadau haste mahāyaśāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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