वाल्मीकि रामायण 2.103.19
ता: पाणिभि: सुखस्पर्शैर्मृद्वङ्गुलितलै: शुभै: ।प्रममार्जू रज: पृष्ठाद्रामस्यायतलोचना:॥
tā: pāṇibhi: sukhasparśairmṛdvaṅgulitalai: śubhai: |pramamārjū raja: pṛṣṭhādrāmasyāyatalocanā: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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