वाल्मीकि रामायण 2.105.2
रजन्यां सुप्रभातायां भ्रातरस्ते सुहृद्वृता: ।मन्दाकिन्यां हुतं जप्यं कृत्वा राममुपागमन्॥
rajanyāṃ suprabhātāyāṃ bhrātaraste suhṛdvṛtā: |mandākinyāṃ hutaṃ japyaṃ kṛtvā rāmamupāgaman ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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