वाल्मीकि रामायण 2.106.5
परावरज्ञो यश्च स्यात्तथा त्वं मनुजाधिप ।स एवं व्यसनं प्राप्य न विषीदितुमर्हति॥
parāvarajño yaśca syāttathā tvaṃ manujādhipa |sa evaṃ vyasanaṃ prāpya na viṣīditumarhati ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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