वाल्मीकि रामायण 2.107.3
पुरा भ्रात: पिता न: स मातरं ते समुद्वहन् ।मातामहे समाश्रौषीद्राज्यशुल्कमनुत्तमम्॥
purā bhrāta: pitā na: sa mātaraṃ te samudvahan |mātāmahe samāśrauṣīdrājyaśulkamanuttamam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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