वाल्मीकि रामायण 2.107.4
दैवासुरे च सङ्ग्रामे जनन्यै तव पार्थिव: ।सम्प्रहृष्टो ददौ राजा वरमाराधित: प्रभु:॥
daivāsure ca saṅgrāme jananyai tava pārthiva: |samprahṛṣṭo dadau rājā varamārādhita: prabhu: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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