वाल्मीकि रामायण 2.108.2
साधु राघव माभूत्ते बुद्धिरेवं निरर्थिका ।प्राकृतस्य नरस्येव ह्यार्यबुद्धेर्मनस्विन:॥
sādhu rāghava mābhūtte buddhirevaṃ nirarthikā |prākṛtasya narasyeva hyāryabuddhermanasvina: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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